Thursday, November 9, 2017

धुंध ही धुंध



यह धुआं धुआं सा रहने दो मुझे दिल की बात कहने दो
मैं पागल दीवाना तेरा मुझे इश्क़ की आग में जलने दो.... 


दिल्ली का हाल देखकर यह गाने के बोल याद गए यह इश्क़ ही तो है ज़्यादा पैसा कमाने से सुविधाओं से और उनपर इतनी मनमानियों से की गैजेट्स और हर तरह के नए उत्पाद इस्तेमाल करने के चक्कर में इतना उत्पात मचा दिया हम सबने। एक चक्र है जो आपस में हर बात को जोड़ता हुआ चलता है। दिल्ली जहाँ रोज़ इतनी तादाद में लोग अलग अलग जगहों से पहुंचते हैं कुछ पड़ने के लिए तो कुछ नौकरी की तलाश में हम भी गए थे और कुछ साल वहां गुज़ारे और हर दुसरे इंसान का आना जाना तो कभी बस जाना राजधानी में लगा ही रहता है। सभी पोलिटिकल काम, मीडिया ऑफिसेस, फैक्ट्रीज इंडस्ट्रीज़, ओपोर्चुनिटीज़,बीपिओस,मार्केटिंग एडवरटाइजिंग एजेंसीज, मीटिंग्स, ब्रांड्स,टेक्नोलॉजीज सब का हब है। मुंबई जाना हर किसी का इतना आसान नहीं होता जितना दिल्ली क्यूंकि अब दिल्ली दूर नहीं। इतने लोगों का जमावड़ा जब लगेगा तो प्रदुषण तो होगा ही और कारण भारत की आबादी। अब जितने सदस्य बढ़ते जायेंगे ज़रूरतें भी बढ़ेंगी जिनमें घर बनाना, ऑफिस बनाना, शॉपिंग करना, नए कपड़े सामान खरीदना,ट्रक्स का आना जाना,एक घर में 3-5 गाड़ियां होना, सबके अलग मित्र होना,अलग अलग फ्लैट्स खरीदना,अलग रिश्तेदार होना उनका आना जाना, पार्टीज करना,पर्सनल गाड़ियों से टूर प्लान करना,गाड़ियों का पटाखों का फैक्ट्रीज का प्रदुषण किसानों का पराल जलाना ये सब मिले जुले कारण हैं। 


तो फिर किया क्या जाए हमारे इस भौतिकवादी इश्क़ का जिसकी लत हमें लग गयी है क्यूंकि आधुनिकरण में सभी इलेक्ट्रिकल एप्लायंसेज कम्प्यूटर्स मोबाइल फ़ोन्स,गाड़ियां सब शामिल हो जाते हैं जिनपर हम सभी की जीवनशैली निर्भर हो चुकी है फिर चाहे दिल्ली हो या कोई भी देश। इस आपाधापी के माहौल में धुंध भरे समाज में वातावरण के कल्याण के लिए क्यों न खुद से एक पहल करी जाए जिससे आने वाला कल थोड़ा साफ़ दिखाई दे और सरकारों को भी चाहिए की नए नए डेवलपमेंट्स या दुसरे देशों से आगे चलने की होड़ में बुलेट ट्रैन जैसी बेकार की योजनाओं पर करोड़ों रूपये खर्च करने की बजाये वर्तमान में चल रही नीतियों और पुरानी योजनाओं को क्रियान्वित कर सही से पहले लागु किया जाए। क्यों न स्मार्ट सिटी के साथ साथ स्मार्ट गांव स्मार्ट कसबे भी बनाये जाएँ जिससे पलायन भी रुकेगा रोज़गार भी बढ़ेगा शहरों में बढ़तीं आबादी का दबाव भी कम 
होगा।

अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम इस सृष्टि को खुद ही नष्ट कर देंगे ऐसा ही  सन्देश देती हुई  हाल ही में टाइगर श्रॉफ की फिल्म आयी थी फ्लाइंग जट्ट आज हालत यह है की मास्क पहनकर बाहर  निकलना पड़ रहा है एयर प्यूरीफायर लगाने की सलाह दे रहे हैं एक्सपर्ट्स जो सबके बस की बात तो नहीं हैपहले ही  हम साफ़ पानी खरीद कर पीने के लिए मजबूर हैं अब साफ़ हवा भी खरीदने को मजबूर हो गए हैं यह कैसा विकास का मॉडल हम और आप तैयार कर रहे हैं अपने आने वाले कल के लिए जहाँ सिर्फ धुंध ही धुंध है




Friday, November 3, 2017

गंगा यात्रा




निश्छल शीतल जल लिए
करती कल-कल शोर
गोद में माँ की डुबकी लगा
हो जाते भाव विभोर।

कार्तिक माह की पूर्णिमा के  गंगा स्नान का हिन्दू धर्म में बहुत बड़ा महत्व है और हो भी क्यों ना,
गंगा भारत की पवित्र नदियों में से एक है जिसे जीवनदायनी माँ के रूप में पूजा जाता है।
माना जाता है की गंगा नदी में इस दिन स्नान करने से मन के पाप तन के मैल धूल जाते हैं
धर्म कर्म के बहुत से कार्यों में गंगा जल की अपनी भूमिका है
तरह तरह के संस्कार, पूजन एवं कार्य इस जल से शुद्ध किये जाते हैं
और सबसे ज़रूरी बात की बहुत से जीव जंतुओं का जीवन इस जल पर निर्भर है 
जल बिन मछली ही नहीं हम सब अधूरे हैं।

हिन्दू धर्म में प्राकृतिक स्त्रीलिंग को भी पूजनीय माना गया है।
स्त्री, गाय माता,धरती माँ,तुलसी माँ, प्रभु के आगे जलाई जाने वाली ज्योती
सूरज की किरणे, चाँद की चांदनी, हवा, नदियां,ध्वनि, दृष्टि, बुद्धि, वाणी,संगीत
खुद ये संपूर्ण सृष्टि और प्रकृति  देवी का रूप है।

पर अफ़सोस की जो हश्र स्त्री का हुआ है इस समाज में
वही शोषण इस पावन नदी का भी हो रहा है
जिस पाप को धोने पवित्र होने श्रद्धालु लाखों की तादाद में पहुंचते हैं
ज़रा उनसे पूछा जाए की क्या वाक़ई आज भी उन्हें गंगा घाट पे वो सुकून वो सफाई मिलती है।
 एक बार हरिद्वार के गंगा घाट पर मैं अपने परिवार के साथ बैठी बैकग्राउंड नोइसिस (आरती के भेंट के पैसे दे दीजिये पुण्य कमाइए,कान साफ़ कराइये, मुंडन कराइये) के बीच
उस दृश्य का आनंद लेने की कोशिश कर रही थी
और मैंने बोला हे भगवान यहाँ तो हमें शान्ति से बैठने दो
तभी पीछे से एक माला बेचने वाला बोला-
“शांति चाहिए तो घर जाओ मैडम वो तो वहीँ मिलती है”
उसकी इस बात पे हम सब हँस पड़े :)
और मैंने भी सोचा की ये सब तो बेचारे बेरोज़गारी की मजबूरी का शोर मचा रहे हैं
रोटी कमाकर भूख मिटायेंगे तो इन्हे भी शांति मिलेगी।  :) :)

गंगा घाट पर एक नज़ारा आरती का,एक नज़ारा भीड़ का
वो भीड़ जिसमें से जाने कितने लोग पॉलिथीन ,बोतल, कचरा सब वहीँ फेक देते हैं।
डुबकी लगाते वक़्त एक नज़र महिलाओं पर रखते हैं
मौज मस्ती में मौका परस्ती से छेड़ भी लेते हैं।
बड़ा ही हास्यास्पद है ये कहना की हमारे देश में जहाँ घर की महिलाओं, माताओं और बहनो को
 सीमा में रहना, छोटे वस्त्र पहनना, पराये मर्दों के सामने परदे में रहना सिखाया जाता  है
वहीँ आस्था के नाम पर आप वहां  बहुत से लोगों को समूह में अटपटे कपड़ों में अर्धनग्न स्नान करता हुआ देख सकते हैं इनमें से हर किसी के मन में भक्ति नहीं मिलेगी  क्यूंकि स्वच्छ तो अब
न तो मन है न विचार हैं,कोई दिक्कत भी नहीं क्यूंकि ये आस्था का सवाल है

सवाल स्वच्छ गंगा अभियान पर सरकार द्वारा खर्च किये करोड़ो रुपयों का भी है
गंगा सफाई अभियान - सफर जो शुरू किया था 1985 में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने.
जिसे दोबारा शुरू किया गया 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा
हज़ारों करोड़ रुपये इतने सालों में खर्च किये गए पर नतीजा सिफर

भाइयों और बहनों “नमामि गंगे”
बोलो हर हर गंगे……

"अबकी जो डुबकी लगाओ तुम
मन में यह प्रण भर लेना
जितनी गहरी सांस लिए
गंगा में समाओ तुम
उतना ही गहरा ठान लिए
गंगा को स्वच्छ बनाओ तुम"

 उत्तराखंड हाई कोर्ट की तरफ से गंगा नदी को देश की पहली जीवित नदी घोषित कर दिया गया है
और इसे वो सारे अधिकार मिलेंगे जो मानव को मिलते हैं. कोई भी अगर गंगा को नुक्सान पहुंचाता  है तो अपराधी माना जायेगा। गंगा के संरक्षण के लिए ये कदम ज़रूरी था और विडम्बना यह भी है की अब इस मानव को भी कहीं अधिकार की क़तार में ही खड़ा कर दिया जाए.

* हर दिन करीब 1.7 बिलियन लीटर कचरा गंगा में पहुंचता है
* कभी अधजली लाशें तो कभी पूरा ही मृत शरीर गंगा में प्रवाह कर दिया जाता है
* तमाम कारखाने, हानिकारक कीटनाशक और दवाइयों से गंगा नदी में बैक्टीरिया का लेवल 5500
तक पहुंच चूका है जो अनुग्य सीमा से सौ गुना ज़्यादा है.
*विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार गंगा नदी को दुनियां की पांच सबसे ज़्यादा दूषित नदियों में से एक  बताया गया है.

यह सब जानकर हम खुद को पवित्र करने जाते हैं या शरीर को बीमारियों में डुबोने
इस पर बहस भी आस्था की बात है क्योकि धर्म की बात है  मान्यताओं की बात है जिसपर सवाल पूछना संदेह है और जिसके जवाब हम खुद से कभी नहीं पूछते।
आँख मूंदे भेड़ चाल चलते हैं. कहीं धर्म गुरु, पुरोहित या समाज के धर्म के ठेकेदार बुरा मान जाएँ।
 
धर्म नीति है और अब एक चेहरा इसका राजनीति भी है
समझ ये नहीं आता की गंगा स्वच्छ हुयी या नोटबंदी से नोट..

गंगा मइया भी मनुष्य से कहती होंगी-
 
शिव ने निर्मल किया
शव ने मोहे छल लिया
तुम खाता बोते
मैं ख़ता को धोते
 सुरधुनी बहती रही...